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बृज

Braj Mandal

बृज भगवान श्रीकृष्‍ण का यहां पर जन्‍म हुआ एवं जहां उन्‍होंने रस भरी बाल लीलायें की दुष्‍टों का संहार किया अपने भक्‍तों को सुख दिया उसी का नाम बृज है । यह बृज चौरासी कोस में फैला हुआ है । जिसके अंदर अनेकों कुंड हैं, अनेकों गुफाएं हैं एवं अनेकों मंदिर हैं । इस बृज में तीन वस्‍तुएं द्वापर युग के समय की है । जो वास्‍तविक है जैसे यमुना जी, बृज रज, गिरिराज जी इन सभी वस्‍तुओं को मिलाकर यह पावन बृज माना जाता है जिसमें जो प्रमुख स्‍थान वो है श्री गिरिराज जी की तलहटी जिसकी परिक्रमा सात कोस की है यानि 21 कि.मी. की है ।

इस बृज में आने के लिए स्‍वयं देवता भी लालायित रहते हैं एवं यहां की मिटटी को भी मस्‍तक पर लगाने के लिए एवं जहां के बृजवासियों की झूठन खाने के लिए तेतीस करोड देवता भी तरसते हैं ऐसे ही बृज प्रदेश में एक गांव पडता है गांठौली ।

गांव गांठौली

द्वापर युग में इस स्‍थान पर कोई नहीं बसा हुआ था । केवल यहां पर मिट्टी के टीले थे एवं भयानक जंगल था । लेकिन उसी समय यहां पर भगवान श्री राधाकृष्‍ण अपनी अष्‍ट सखियों के साथ में यहां के एक मिट्टी के सिंहासन पर होली खेलते हुए आकर बैठ गए । उसी समय ललिता सखी ने पीछे से दोनों के वस्‍त्रों को चुपचाप गांठ लगा दी । कुछ समय पश्‍चात जब दोनों खडे होने लगे तब उस गांठ के कारण खडे नहीं हो सके ऐसी रहस्‍यमयी लीला को देखकर सखियां आपस में हंसने लगी । तभी से इस स्‍थान का नाम गांठौली पड गया । यह गांव गोवर्धन डीग के राजमार्ग पर है । कभी कभी श्री नाथ जी म्‍लेच्‍छों के भय का बहाना दिखलाकर भक्‍तों को दर्शन देने के लिए पधारते थे ।

 

 जब श्री चैतन्‍य महाप्रभु गोवर्धन आए तब उनको श्री नाथ गोपाल जी के दर्शन करने की तीव्र लालसी हुई उसी समय म्‍लेच्‍छों के आक्रमण के भ्‍य से पुजारियों ने श्री गोपाल जी अर्थात श्रीनाथ जी को तीन दिन तक गांठौली में विराजमान कराया था । श्री चैतन्‍य महाप्रभु  जी गोवर्धन पर्वत पर नहीं चढते थे क्‍योंकि वे इन्‍हें श्रीकृष्ण का स्‍वरूप मानते थे । इसलिए इनके अनुयायी कोई भी गौडीय वैष्‍णव गोवर्धन पर्वत पर नहीं चढते थे । श्री रूप सनातन भी उसी प्रकार गोवर्धन के ऊपर नहीं चढते थे । श्री चैतन्‍य महाप्रभु जी को जब यह पता चला कि गोपाल जी गांठौली गांव में पधारे हुए हैं

तो तीन दिन रहकर उन्‍होंने भाव में विभोर होकर इनकी परिक्रमा की एवं स्‍तुति करते हुए इनके सामने नृत्‍य और संकीर्तन किया । ऐसा यह पवित्र एवं पावन यह गांव गांठौली है । इसी के अंतर्गत एक कुण्‍ड है जिसका की नाम गुलाल कुण्‍ड है ।

गुलाल कुण्‍ड

:: Gulal Kund - Braj ::

 

यह कुण्‍ड गांठौली के पास ही राजमार्ग पर बांयी ओर स्थित है जो कि लगभग गांठौली गांव से 300 मी. एवं जतीपुरा गांठौली मार्ग पर स्थित है । इस कुण्‍ड का महत्‍व यह है कि भगवान राधाकृष्‍ण जब अपनी अष्‍ट सखियों को साथ लेकर यहां गांठौली गांव में आए तो यहां होली खेलते हुए आए थे और यहां आकर उन्‍होंने खूब होली खेली, होली खेलने के पश्‍चात यहां पर एवं इनके वस्‍त्रों पर गुलाल लगा हुआ था वह कुण्‍ड के पानी में मिल गया । जिसके कारण इसका नाम गुलालकुण्‍ड पडा । यह कुण्‍ड प्राचीन समय का है एवं यहां पर श्री महाप्रभु बल़लभाचार्य जी की बैठक भी है ।  अब यहां गांठौली गांव काफी बस गया है और दूर-दूर से लोग बृज की परिक्रमा करने के लिए आते हैं और यहां स्‍नान करके अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं । ऐसी यह तीर्थ स्‍थली है जिसका नाम गुलालकुण्‍ड है । श्री गिरिराज महाराज की जय ।

वैसे तो गुलालकुण्‍ड काफी प्राचीन द्वापर युग के समय का है लेकिन युग परिवर्तन के बाद अब कलियुग में इसकी दुर्दशा होती जा रही है । कुछ लोगों ने इस कुण्‍ड के क्षेत्र में अपना अनाधिकृत कब्‍जा कर रखा है । इस कुंड का क्षेत्रफल निरंतर घटता जा रहा है । अगर समय रहते इसका समुचित संरक्षण नहीं किया गया था तो यह कुण्‍ड भी विलुप्‍त हो जाएगा और हम सभी इस अमूल्‍य धरोहर से वंचित हो जाएंगे । इसी प्रकार राधा कुण्‍ड के मान्‍यता से संबंधित समाचार पत्र में छपी एक विवरण यहां प्रस्‍तुत है ।

 

 

 

 
 

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